बच्चों की आँखों का चेकअप — कब और क्यों ज़रूरी है

बच्चों की आँखों की जांच कब करानी चाहिए? पहली जांच जन्म के समय, फिर 6 महीने, 3 साल, और स्कूल शुरू होने पर (5-6 साल) करानी चाहिए। इसके बाद हर 1-2 साल में नियमित जांच ज़रूरी है। अगर बच्चा आँखें भेंचकर देखता है, टीवी के बहुत पास बैठता है, या सिरदर्द की शिकायत करता है — तो तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से मिलें।

बच्चों की आँखों की समस्याएं अक्सर छुपी रहती हैं क्योंकि छोटे बच्चे खुद बता नहीं पाते कि उन्हें ठीक से दिख नहीं रहा। वे सोचते हैं कि सबको ऐसा ही दिखता है। अगर समय पर पता न चले तो ये समस्याएं बच्चे की पढ़ाई, विकास, और आत्मविश्वास पर गहरा असर डाल सकती हैं।

भारत में लगभग 5-7% स्कूल जाने वाले बच्चों में आँखों की कोई न कोई समस्या होती है। प्रयागराज, मिर्ज़ापुर, और कौशाम्बी जैसे ज़िलों के ग्रामीण इलाकों में तो बच्चों की आँखों की जांच की सुविधा ही बहुत कम है। इंदुमती नेत्रालय इसी कमी को पूरा करने के लिए गाँवों और स्कूलों में मुफ्त आई कैंप लगाता है।

उम्र के अनुसार कब कराएं जांच

जन्म के समय (0-1 महीना)

अस्पताल में डॉक्टर बच्चे की आँखों की बेसिक जांच करते हैं — रेड रिफ्लेक्स (पुतली में लाल चमक), आँखों की बनावट, और जन्मजात मोतियाबिंद या ग्लूकोमा की जांच। समय से पहले जन्मे बच्चों (premature) की ROP (Retinopathy of Prematurity) जांच बहुत ज़रूरी है।

6 महीने की उम्र

इस उम्र तक बच्चे की आँखें एक साथ काम करने लगती हैं। डॉक्टर जांचते हैं कि दोनों आँखें सीधी हैं या भेंगी, बच्चा चीज़ों को देख रहा है या नहीं, और आँखों की गति सामान्य है या नहीं।

3 साल की उम्र

इस उम्र में बच्चा चित्रों या अक्षरों से नज़र की जांच करा सकता है। चश्मे का नंबर, भैंगापन (squint), और आलसी आँख (lazy eye / amblyopia) का पता लगाया जा सकता है। यह जांच बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 7 साल की उम्र तक इलाज करने पर सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं।

5-6 साल (स्कूल शुरू होने पर)

स्कूल जाने से पहले पूरी आँखों की जांच ज़रूरी है। बोर्ड पर लिखा न दिखना, कॉपी में गलतियाँ करना — ये सब कमज़ोर नज़र के संकेत हो सकते हैं। इस उम्र में चश्मा लगाने से बच्चे की पढ़ाई और विकास में बहुत फ़र्क़ पड़ता है।

इसके बाद — हर 1-2 साल में

स्कूल के दौरान हर 1-2 साल में नियमित जांच कराते रहें। 8-15 साल की उम्र में चश्मे का नंबर तेज़ी से बदल सकता है। मोबाइल और कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल से बच्चों में मायोपिया (दूर का नंबर) तेज़ी से बढ़ रहा है।

चेतावनी के संकेत — इन पर ध्यान दें

बच्चों में आँखों की समस्या के ये संकेत माता-पिता को पहचानने चाहिए:

  • आँखें भेंचकर या सिकोड़कर देखना: बच्चा दूर की चीज़ें देखने के लिए आँखें सिकोड़ता है — यह मायोपिया (दूर का नंबर) का सबसे आम संकेत है
  • टीवी या किताब के बहुत पास बैठना: स्क्रीन या किताब बहुत पास लाकर देखना नज़र कमज़ोर होने का संकेत है
  • बार-बार सिरदर्द: खासकर स्कूल से आने के बाद या पढ़ने के बाद सिरदर्द — आँखों पर ज़ोर पड़ने से होता है
  • आँखें रगड़ना: बार-बार आँखें रगड़ना एलर्जी, ड्राई आई, या थकान का संकेत हो सकता है
  • एक आँख बंद करके देखना: अगर बच्चा एक आँख बंद करके देखता है तो दोनों आँखों की नज़र में बड़ा अंतर हो सकता है
  • पढ़ने में कठिनाई: लाइन छोड़ना, शब्दों को उल्टा पढ़ना, या जल्दी थक जाना
  • आँख का तिरछा होना: एक या दोनों आँखों का अंदर या बाहर की तरफ़ मुड़ जाना (भैंगापन)
  • रोशनी से परेशानी: तेज़ रोशनी में बहुत ज़्यादा आँखें बंद करना या चुंधियाना

भैंगापन (Squint / Strabismus)

भैंगापन वह स्थिति है जिसमें दोनों आँखें एक ही दिशा में नहीं देखतीं — एक आँख सीधी देखती है और दूसरी अंदर, बाहर, ऊपर, या नीचे की तरफ़ मुड़ी होती है। भारत में लगभग 3-4% बच्चों में भैंगापन होता है।

क्यों ज़रूरी है इलाज: भैंगापन सिर्फ़ दिखने की समस्या नहीं है। अगर समय पर इलाज न हो तो तिरछी आँख "आलसी" हो जाती है — यानी दिमाग उस आँख से आने वाली तस्वीर को अनदेखा करने लगता है। 7-8 साल की उम्र के बाद इलाज करना बहुत मुश्किल हो जाता है।

इलाज: चश्मा, पैचिंग (अच्छी आँख पर पट्टी लगाकर कमज़ोर आँख को मज़बूत करना), एक्सरसाइज़, या ज़रूरत पड़ने पर सर्जरी। इंदुमती नेत्रालय में भैंगापन की सर्जरी उपलब्ध है।

आलसी आँख (Lazy Eye / Amblyopia)

आलसी आँख (Amblyopia) तब होती है जब एक आँख की नज़र दूसरी से काफ़ी कमज़ोर हो जाती है — चश्मा लगाने के बाद भी पूरी तरह ठीक नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बचपन में दिमाग और आँख का कनेक्शन ठीक से नहीं बन पाता।

कारण: भैंगापन, दोनों आँखों में बहुत अलग नंबर, या कोई चीज़ जो रोशनी को आँख में जाने से रोकती है (जैसे जन्मजात मोतियाबिंद)।

महत्वपूर्ण: 7 साल की उम्र तक इलाज करने पर सबसे अच्छे नतीजे मिलते हैं। इसके बाद दिमाग का विकास पूरा हो जाता है और इलाज कम प्रभावी होता है। इसीलिए बच्चों की जल्दी जांच बहुत ज़रूरी है।

स्कूल में आँखों की जांच

इंदुमती नेत्रालय प्रयागराज, मिर्ज़ापुर, और कौशाम्बी ज़िलों के स्कूलों में मुफ्त आँखों की जांच कैंप लगाता है। इन कैंपों में:

  • सभी बच्चों की नज़र की जांच (Vision Screening) होती है
  • भैंगापन और अन्य समस्याओं की पहचान की जाती है
  • ज़रूरत पड़ने पर मुफ्त चश्मे दिए जाते हैं
  • गंभीर मामलों को अस्पताल रेफर किया जाता है

अब तक 300 से अधिक गाँवों में मुफ्त कैंप लगाए जा चुके हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे के स्कूल में आई कैंप लगे, तो हमसे संपर्क करें।

इंदुमती नेत्रालय में बच्चों की आँखों का इलाज

इंदुमती नेत्रालय प्रयागराज के मेजा रोड पर स्थित NABH प्रमाणित नेत्र अस्पताल है जहाँ बच्चों की आँखों की हर तरह की जांच और इलाज उपलब्ध है:

  • कंप्यूटराइज़्ड आई टेस्ट: सटीक चश्मे का नंबर
  • भैंगापन जांच और इलाज: चश्मा, पैचिंग, और सर्जरी
  • आलसी आँख का इलाज: पैचिंग थेरेपी
  • जन्मजात मोतियाबिंद: सर्जरी उपलब्ध
  • बच्चों के अनुकूल माहौल: बच्चों को डर न लगे इसका ध्यान रखा जाता है

बच्चों की आँखों की जांच सिर्फ ₹100 में। आयुष्मान भारत कार्ड धारकों के लिए जांच और इलाज मुफ्त है।

माता-पिता के लिए ज़रूरी बातें

  • बच्चे का स्क्रीन टाइम सीमित रखें — 2 साल से कम उम्र में स्क्रीन न दें, बड़े बच्चों के लिए दिन में 1-2 घंटे तक
  • बच्चे को बाहर खेलने भेजें — शोध बताते हैं कि बाहर धूप में समय बिताने से मायोपिया बढ़ने की रफ़्तार कम होती है
  • पढ़ते समय पर्याप्त रोशनी रखें और किताब आँखों से 30-40 सेमी दूर रखें
  • हर 20 मिनट पढ़ने के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और दूर देखें
  • पोषक आहार दें — हरी सब्ज़ियाँ, गाजर, अंडे, मछली — ये सब आँखों के लिए अच्छे हैं

बच्चे की आँखों की जांच कराएं

अपने बच्चे की आँखों को सुरक्षित रखें। आज ही इंदुमती नेत्रालय में जांच कराएं।

कॉल करें — +91 8081565880